नववर्ष नहीं, नवचेतना का आह्वान है – माघ मास और कुलदीप सिंह राठौड़ का सांस्कृतिक संदेश

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नववर्ष नहीं, नवचेतना का आह्वान है – माघ मास और कुलदीप सिंह राठौड़ का सांस्कृतिक संदेश


✍️ अजय उपाध्याय एवं देवेंद्र सिंह बघेल

जब पूरी दुनिया पश्चिमी नववर्ष के शोर-शराबे में डूबी होती है, आतिशबाज़ी और कृत्रिम उल्लास के बीच अपनी जड़ों को भूलती चली जाती है, ऐसे समय में कुछ स्वर ऐसे भी होते हैं जो हमें हमारी मिट्टी, परंपरा और आत्मा से जोड़ने का कार्य करते हैं। ऐसा ही एक सशक्त, ओजस्वी और चिंतनशील स्वर है — कुलदीप सिंह राठौड़ का।

उनकी कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक उद्घोष है।
“ईस्वी सन तो याद रहा, पर अपना संवत्सर भूल गए”—
यह पंक्ति केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि उस विस्मृति पर करारा प्रहार है जिसमें हम अपनी हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं को त्यागकर उधार की खुशियों में मग्न हो गए हैं।

कुलदीप सिंह राठौड़ राजस्थान की उस धरती से निकले हैं, जहाँ शौर्य, संस्कृति और संस्कार पीढ़ियों से प्रवाहित होते आए हैं। राजघराने की पृष्ठभूमि से निकलकर उन्होंने विश्व-पटल पर भारत का नाम रोशन किया। आज वे अमेरिका, नॉर्वे, जर्मनी, जापान सहित लगभग 40 देशों में अपने सफल व्यवसायिक परिचय के साथ-साथ भारतीय संस्कृति के संवाहक के रूप में भी जाने जाते हैं। वे केवल प्रवासी भारतीय नहीं, बल्कि चलती-फिरती सांस्कृतिक धरोहर हैं।

उनकी कविता हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति स्वयं चैत्र की प्रतीक्षा कर रही है। जब धरती ठिठुर रही हो, पेड़ों की डालियाँ सूनी हों, पर्वत बर्फ से ढके हों—तो यह उल्लास का समय नहीं, आत्ममंथन का समय है। भारतीय नववर्ष, जो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है, वह केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि प्रकृति के नवसृजन का उत्सव है। इसी भाव को वे उद्घोषित करते हैं कि

> “हम अपना नववर्ष मनाएंगे, न्यू ईयर हमें स्वीकार नहीं।”

यह कथन किसी संस्कृति का विरोध नहीं, बल्कि स्वाभिमान की पुनर्स्थापना है।

इसी नवचेतना के साथ आता है माघ मास—साधना, संयम और शुद्धि का पर्व। माघ मेला केवल स्नान का आयोजन नहीं, बल्कि आत्मा के मैल को धोने का माध्यम है। ब्रह्ममुहूर्त में किया गया प्रातः स्नान मन, बुद्धि और संस्कारों को निर्मल करता है। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ स्नान से आयुष्य, आरोग्य, सदाचरण और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

आज जब नई पीढ़ी दिशाहीनता की ओर बढ़ रही है, तब माघ मास का यह संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। कुलदीप सिंह राठौड़ का चिंतन बताता है कि डांट-फटकार नहीं, बल्कि संस्कारों का स्पर्श बच्चों के जीवन को बदल सकता है। माघ मास का स्नान, सत्संग और संयम बच्चों को सदाचार की ओर सहज ही प्रवृत्त कर देता है।

‘पद्म पुराण’ का उल्लेख करते हुए वे बताते हैं कि माघ मास में जप, होम और दान का विशेष महत्व है। यह वह समय है जब व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं, समाज और मानवता के लिए भी सोचता है। यही कारण है कि कुलदीप सिंह राठौड़ अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के संरक्षक के रूप में सामाजिक और सांस्कृतिक उत्थान का कार्य कर रहे हैं।

उनका जीवन स्वयं एक संदेश है—कि आधुनिकता और परंपरा विरोधी नहीं, बल्कि सहयात्री हो सकती हैं। विश्व के मंच पर सफलता प्राप्त करते हुए भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही सच्ची उपलब्धि है।

आज आवश्यकता है कि हम उनके इस संदेश को केवल पढ़ें नहीं, बल्कि जीएँ।
माघ मास के पुण्य अवसर पर, नववर्ष के वास्तविक अर्थ को समझते हुए, आइए हम भी संकल्प लें कि
🚩 आर्यवृत के वासी होने का गर्व पुनः जागृत करेंगे
🚩 अपना नववर्ष 19 मार्च 2026 को मनाएंगे
🚩 और भारतीय संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक अक्षुण्ण बनाए रखेंगे।

यही माघ मेला का सार है, यही नववर्ष का सच्चा उत्सव है। 🌺🕉🚩

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