अश्मिता चंद: सत्ता नहीं, संघर्ष की राजनीति — नारी शक्ति से प्रदेश नेतृत्व तक का विस्फोटक उदय ✍︎ विशेष राजनीतिक विश्लेषण रिपोर्ट

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अश्मिता चंद: सत्ता नहीं, संघर्ष की राजनीति — नारी शक्ति से प्रदेश नेतृत्व तक का विस्फोटक उदय

✍︎ विशेष राजनीतिक विश्लेषण रिपोर्ट

भारतीय लोकतंत्र की आत्मा केवल संसद और विधानसभाओं में नहीं बसती, बल्कि उन गलियों, पंचायतों और कस्बों में सांस लेती है जहाँ से सच्चे जननेता जन्म लेते हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज एक ऐसा नाम मजबूती से उभर रहा है, जिसने राजनीति को सुविधा नहीं बल्कि सेवा, संघर्ष और संविधानिक मूल्यों का माध्यम बनाया—अश्मिता चंद।

उनकी राजनीतिक यात्रा किसी सत्ता की कृपा नहीं, बल्कि जनता के विश्वास, संगठनात्मक तपस्या और नारी शक्ति के आत्मबल की जीवंत मिसाल है। अश्मिता चंद आज केवल एक नेता नहीं, बल्कि गरीबों की आवाज़, महिलाओं की उम्मीद और युवाओं के सपनों की प्रतिनिधि बनकर उभर रही हैं।

 

जमीन से जन्मी राजनीति: 2006 से शुरू हुआ जनसंघर्ष

वर्ष 2006—यह केवल एक चुनावी साल नहीं था, बल्कि अश्मिता चंद के जीवन में जनसेवा की शपथ का वर्ष था। गोला बाजार के स्थानीय निकाय चुनाव में जब 11 सदस्यों की जीत के साथ जनप्रतिनिधित्व मजबूत हुआ, तभी यह स्पष्ट हो गया कि यह राजनीति सत्ता के लिए नहीं, बल्कि समस्या के समाधान के लिए है।

उस दौर में अश्मिता चंद ने कुर्सी से नहीं, चौपाल से राजनीति सीखी। पानी, सड़क, शिक्षा, राशन, महिलाओं की सुरक्षा—हर मुद्दा उनके लिए फाइल नहीं, जीवन का सवाल था। स्थानीय निकायों में सक्रिय रहते हुए उन्होंने यह सिद्ध किया कि लोकतंत्र की असली प्रयोगशाला गांव और कस्बे होते हैं।

निर्दलीय संघर्ष: 2007 में साहस का ऐलान

वर्ष 2007 में जब अश्मिता चंद ने धुरियापार से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का निर्णय लिया, तब यह कदम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। बिना धनबल, बिना बड़े झंडे—सिर्फ जनता और आत्मविश्वास के सहारे चुनाव लड़ना आसान नहीं होता।

यह चुनाव भले ही सत्ता तक न पहुँचा हो, लेकिन इसने अश्मिता चंद को वह पहचान दी जो किसी जीत से बड़ी होती है—जनविश्वास। उन्होंने उस दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सम्मान, किसान और श्रमिकों के अधिकारों को संविधान की भावना के अनुरूप मजबूती से उठाया।

यही वह मोड़ था जहाँ अश्मिता चंद को “नेता” नहीं, बल्कि जननेता के रूप में देखा जाने लगा।

भाजपा के साथ वैचारिक समर्पण: 2008 से संगठन की रीढ़

वर्ष 2008 से अश्मिता चंद का भारतीय जनता पार्टी से सक्रिय जुड़ाव शुरू हुआ। अगले एक दशक से अधिक समय तक वे संगठन की निष्ठावान सिपाही के रूप में कार्य करती रहीं।

उन्होंने:

बूथ स्तर से लेकर मंडल तक संगठन को मजबूती दी

चुनावों में रणनीति, संवाद और जनसंपर्क की जिम्मेदारी निभाई

महिला, युवा और वंचित वर्गों को संगठन से जोड़ा

अश्मिता चंद की राजनीति पोस्टर और मंच तक सीमित नहीं रही। वे हर उस जगह खड़ी दिखीं जहाँ संविधान के तहत नागरिक अधिकारों की बात होनी चाहिए थी।

नारी शक्ति का प्रदेशीय उदय: 2021 में ऐतिहासिक जिम्मेदारी

वर्ष 2021 में जब उन्हें भाजपा महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया, तो यह केवल पद नहीं, बल्कि नारी नेतृत्व की स्वीकार्यता थी।

इस भूमिका में उन्होंने महिला सशक्तिकरण को नारे से निकालकर जमीनी अभियान बनाया। घरेलू हिंसा, स्वावलंबन, राजनीतिक भागीदारी और सामाजिक सम्मान—हर मोर्चे पर उन्होंने महिलाओं की आवाज़ को बुलंद किया।

उनका स्पष्ट मानना रहा कि महिला मोर्चा कोई सहायक इकाई नहीं, बल्कि नीति निर्माण की सशक्त शक्ति है।

2027: चिल्लूपार से बदलाव का शंखनाद

अब 2027 की ओर बढ़ते कदमों के साथ, चिल्लूपार से विधायकी का संकल्प अश्मिता चंद की राजनीति का अगला निर्णायक अध्याय है। यह क्षेत्र किसान, मजदूर, महिलाएँ और युवाओं की आकांक्षाओं का केंद्र है।

अश्मिता चंद का जमीनी अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और गरीबों के लिए लड़ने की प्रतिबद्धता उन्हें एक मजबूत और विश्वसनीय दावेदार बनाती है।

निष्कर्ष: सत्ता नहीं, संविधान की राजनीति

अश्मिता चंद की यात्रा इस बात का प्रमाण है कि राजनीति अगर ईमानदारी, साहस और सेवा से की जाए, तो वह नारी शक्ति का आंदोलन बन सकती है।

वे आज न केवल एक उभरता नेतृत्व हैं, बल्कि गरीबों की मसीहा, महिलाओं की आवाज़ और लोकतंत्र की जमीनी प्रहरी के रूप में स्थापित हो रही हैं।

आने वाला समय यह तय करेगा कि अश्मिता चंद उत्तर प्रदेश की राजनीति में किस ऊँचाई तक पहुँचती हैं, लेकिन इतना तय है—

यह संघर्ष रुकने वाला नहीं है।

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