साउखोर–असवनपार मार्ग बदहाल, पूर्वांचल की जीवनरेखा पर संकट वरिष्ठ संवाददाता: प्रहलाद मौर्य

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साउखोर–असवनपार मार्ग बदहाल, पूर्वांचल की जीवनरेखा पर संकट

वरिष्ठ संवाददाता: प्रहलाद मौर्य

पूर्वांचल के दक्षिणी छोर को कई जिलों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण साउखोर–असवनपार मार्ग आज बदहाली और उपेक्षा का प्रतीक बन चुका है। यह मार्ग न केवल स्थानीय आवागमन का साधन है, बल्कि आजमगढ़, मऊ, गोरखपुर, देवरिया और कुशीनगर जैसे जिलों को संक्षिप्त एवं सुगम रूप से जोड़ने वाला एक अहम संपर्क मार्ग भी है। बावजूद इसके, सड़क की वर्तमान स्थिति अत्यंत दयनीय है और आम जनता रोज़ जान जोखिम में डालकर इस पर चलने को मजबूर है।

साउखोर से असवनपार तक सड़क जगह-जगह गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। कहीं डामर पूरी तरह उखड़ चुका है तो कहीं बड़े-बड़े गड्ढे हादसों को खुला निमंत्रण दे रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार अब तक इस मार्ग पर 20 से 25 लोग घायल हो चुके हैं। किसी का सिर फटा, किसी के हाथ-पैर टूटे, तो कई लोग गंभीर रूप से घायल होकर अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं। इसके बावजूद न तो जनप्रतिनिधियों की नींद खुल रही है और न ही संबंधित विभागों की।

ग्रामीणों का आक्रोश साफ झलकता है। उनका सवाल सीधा है—“हम लोगों की क्या गलती है? क्या सिर्फ इसलिए कि इस सड़क से किसी बड़े नेता का रोज़ाना आना-जाना नहीं है, इसे भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?” यह सवाल केवल एक सड़क का नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की प्राथमिकताओं पर भी सीधा प्रहार करता है।

इस मार्ग की उपयोगिता केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है। यह वही इलाका है जो ‘शेरे-पूर्वांचल’ कहे जाने वाले ब्राह्मण शिरोमणि पंडित हरिशंकर तिवारी की जन्मभूमि, कर्मभूमि और उनकी राजनीतिक-सामाजिक विरासत से जुड़ा हुआ है। थाना चिल्लूपार सहित कई ऐतिहासिक, प्रशासनिक और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को यह सड़क जोड़ती है। इसके कारण इस मार्ग का महत्व और भी बढ़ जाता है।

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सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जब पूरा कचरांचल क्षेत्र बाढ़ या जलभराव से जलमग्न हो जाता है, तब यही साउखोर–असवनपार मार्ग एकमात्र सुरक्षित यात्रा साधन बनकर उभरता है। ऐसे समय में लाखों लोगों की आजीविका, आपूर्ति व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं और प्रशासनिक पहुंच इसी सड़क पर निर्भर हो जाती हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध क्षेत्रीय आपदा प्रबंधन और ग्रामीण संपर्क मार्गों से संबंधित रिपोर्टों से भी यह स्पष्ट होता है कि वैकल्पिक मार्गों के अभाव में ऐसे संपर्क मार्गों की भूमिका जीवनरेखा जैसी होती है।

इसके बावजूद सड़क की मरम्मत को लेकर जिम्मेदार विभागों का मौन कई सवाल खड़े करता है। क्या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही प्रशासन जागेगा? क्या लोगों की जान की कीमत इतनी सस्ती है कि वर्षों से शिकायतों के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही?

स्थानीय ग्रामीणों, व्यापारियों और विद्यार्थियों ने एक स्वर में मांग की है कि इस मार्ग की तत्काल मरम्मत कराई जाए। साथ ही इसे दीर्घकालिक समाधान के तहत मजबूत और टिकाऊ निर्माण के साथ पुनः विकसित किया जाए, ताकि बार-बार गड्ढों और हादसों की समस्या से निजात मिल सके।

अब वक्त आ गया है कि प्रशासन इस खबर को केवल एक सामान्य शिकायत न माने, बल्कि पूर्वांचल की जीवनरेखा पर मंडराते खतरे के रूप में देखे। साउखोर–असवनपार मार्ग की उपेक्षा का मतलब केवल एक सड़क की अनदेखी नहीं, बल्कि लाखों लोगों की सुरक्षा, आजीविका और प्रशासनिक पहुंच को खतरे में डालना है। उम्मीद है कि यह मार्मिक और तार्किक आवाज़ जिम्मेदारों तक पहुंचेगी और जल्द ही इस मार्ग पर सुधार के ठोस कदम उठाए जाएंगे।

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