आधुनिक समाज में पालन-पोषण की चुनौतियाँ : एक विश्लेषण

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  • आधुनिक समाज में पालन-पोषण की चुनौतियाँ : एक विश्लेषण

आज के दौर में माता-पिता होना अत्यंत जटिल और चुनौतीपूर्ण हो गया है। जहाँ एक ओर वैश्वीकरण और तकनीकी विकास ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर बच्चों के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास पर कई तरह के जोखिम भी बढ़ा दिए हैं। माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी जीवनशैली के बीच बच्चों को आवश्यक समय और मार्गदर्शन देना कठिन होता जा रहा है। हाल ही में सामने आए कुछ उदाहरण बताते हैं कि पालन-पोषण की दिशा में छोटी-सी चूक भी किस तरह भयवाह परिणाम पैदा कर सकती है।

 

सबसे पहले हाल ही में घटित एक बेहद दुखद घटना का उल्लेख किया जा सकता है। पंजाब के पूर्व पुलिस महानिदेशक मोहम्मद मुस्तफा और उनकी पत्नी, पूर्व मंत्री रज़िया सुल्ताना, पर अपने बेटे अक़ील अख़्तर की हत्या के आरोप में CBI ने मामला दर्ज किया है। यद्यपि यह दंपति इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए इसे नशे की ओवरडोज़ से हुई मृत्यु बताते हैं, परन्तु इस घटना से एक गंभीर सीख अवश्य मिलती है। मुस्तफ़ा ने स्वयं स्वीकार किया कि अपने बेटे को एक प्रतिष्ठित आवासीय विद्यालय में भेजना उनकी बड़ी निर्णयात्मक भूल थी, क्योंकि वही वह पहली बार नशे की ओर धकेला गया। सहपाठियों के प्रलोभन ने उसे धीरे-धीरे नशे का आदी बना दिया और स्थिति इतनी विकट हो गई कि नशा न मिलने पर वह हिंसक व्यवहार करने लगता था। यह उदाहरण दर्शाता है कि माता-पिता की व्यस्त पेशेवर जिंदगी और बच्चों से भावनात्मक दूरी कैसे गंभीर त्रासदियों को जन्म दे सकती है।

 

एक अन्य दुखद उदाहरण देहरादून के प्रसिद्ध केमिस्ट्री शिक्षक का है। यह शिक्षक छात्रों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे, विशेषकर वे छात्र जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते थे। परंतु पिता की व्यस्त कार्यशैली और आर्थिक संपन्नता के चलते उनका 19 वर्षीय पुत्र गलत संगत में पड़ गया और अंततः उसकी मृत्यु नशे की ओवरडोज़ से हो गई। इस घटना ने शिक्षक को इतना आहत किया कि उन्होंने तुरंत अपना ट्यूशन कार्य बंद कर दिया। यह घटना दिखाती है कि अभिभावकों की अनजानी लापरवाही तथा बच्चों को अनियंत्रित आर्थिक स्वतंत्रता देना भी कभी-कभी गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।

 

इसके विपरीत, उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार और पंतनगर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अलकनंदा अशोक का परिवार प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत करता है। उनकी बेटी कुहू गर्ग ने न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बैडमिंटन में अपनी पहचान बनाई, बल्कि 38वें राष्ट्रीय खेलों में उत्तराखंड को रजत पदक दिलाने वाली टीम का हिस्सा भी रहीं। इसके अलावा उन्होंने संघ लोक सेवा आयोग 2023 की परीक्षा में सफलता प्राप्त कर भारतीय पुलिस सेवा में स्थान हासिल किया। उनका पुत्र भी IIT स्नातक है। यह उदाहरण दर्शाता है कि व्यस्त करियर के बावजूद यदि माता-पिता बच्चों के जीवन में सक्रिय रूप से जुड़े रहें, तो वे बच्चों की क्षमताओं को सही दिशा दे सकते हैं।

 

इन तीनों उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि पालन-पोषण केवल आर्थिक सुविधा का प्रश्न नहीं, बल्कि समय, संवेदनशीलता और निरंतर मार्गदर्शन का विषय है। माता-पिता का प्रमुख दायित्व केवल बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना नहीं, बल्कि उन्हें भावनात्मक सुरक्षा, सही संस्कार और संतुलित वातावरण देना भी है। आधुनिक दम्पतियों को माता-पिता बनने से पहले इस जिम्मेदारी पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मेरे एक परिचित, जो पाँच वर्षों से विवाहित हैं, परिवार शुरू करने में संकोच करते हैं क्योंकि दोनों अपने करियर में अत्यधिक व्यस्त हैं। यह सोच समझदारी भरी है, क्योंकि बच्चे समय, धैर्य और निरंतर उपस्थिति की माँग करते हैं।

 

आज तकनीक ने बच्चों के बहुमूल्य समय को छीन लिया है। कई माता-पिता बच्चों को शांत करने के लिए मोबाइल या टैबलेट थमा देते हैं, जिससे अनजाने में उनकी स्क्रीन-निर्भरता बढ़ जाती है। कुछ परिवारों में पिता की अनुपस्थिति या अत्यधिक व्यस्तता बच्चों के व्यवहार पर नकारात्मक प्रभाव डालती है। प्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल के पिता इसका एक सकारात्मक उदाहरण हैं, जिन्होंने अपनी बेटी के प्रशिक्षण, आहार और व्यक्तित्व विकास में अत्यधिक समय लगाया और उसका परिणाम विश्वस्तरीय सफलता के रूप में सामने आया।

 

मैं स्वयं भी स्वीकार करता हूँ कि कई बार अपने व्यक्तिगत संघर्षों में उलझकर मैं अपने बच्चों की भावनात्मक आवश्यकताओं को नहीं समझ पाया। घर पर पढ़ाते समय मेरा कठोर रवैया उन्हें कभी-कभी निराश कर देता था। धीरे-धीरे सीखने को मिला कि हर बच्चा अलग होता है और उसकी क्षमता व रुचि का सम्मान करना चाहिए। मेरी बेटी रुचि विज्ञान और गणित में तो नहीं थी, परंतु अंग्रेज़ी भाषा में उसकी प्रतिभा चमकी और उसे छात्रवृत्ति भी मिली। आज वह मनोविज्ञान के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही है। मेरा बेटा भी अपनी रुचि के अनुरूप करियर में आगे बढ रहा है।

 

अंततः कहा जा सकता है कि सफल पालन-पोषण वह है जो बच्चों को न केवल बाहरी दुनिया में सफल बनाता है, बल्कि उन्हें भीतर से मजबूत, संवेदनशील और आत्मविश्वासी भी बनाता है। समय, संवाद, अनुशासन और भावनात्मक समर्थन—ये चार स्तंभ ही आधुनिक पालन-पोषण की रीढ़ हैं।

 

डॉ. प्रशांत थपलियाल

सह – प्राध्यापक

भारतीय सैन्य अकादमी

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