लूट, लापरवाही और मौत का खेल!
बड़हलगंज में कुकुरमुत्तों की तरह उगे फर्जी अस्पतालों का काला सच उजागर15 वर्षीय अंबिका की मौत ने किया पूरा सिस्टम बेनकाब



सुरेश राजभर की विशेष पड़ताल
बड़हलगंज और आसपास के क्षेत्रों में अस्पताल नहीं, बल्कि मौत के अड्डे चल रहे हैं—यह बात 15 वर्षीय अंबिका की दर्दनाक मौत ने फिर साबित कर दी। पटना चौराहे स्थित रामधनी हॉस्पिटल में हुई इस संदिग्ध मृत्यु ने स्वास्थ्य तंत्र की पोल खोलकर रख दी है। सवाल सिर्फ अंबिका की मौत का नहीं, सवाल है कि आखिर गरीब, दलित और कमजोर परिवारों के साथ ऐसा अत्याचार कब तक जारी रहेगा?
बेलसड़ी निवासी अंबिका पिछले चार दिनों से मामूली पेट दर्द से पीड़ित थी। परिवार ने विश्वास के साथ उसे अस्पताल में भर्ती कराया, पर उन्हें क्या पता था कि इलाज के नाम पर उनकी बच्ची को मौत के मुंह में धकेल दिया जाएगा। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में न प्रशिक्षित डॉक्टर थे, न विशेषज्ञ और न ही गंभीर मरीजों के इलाज का कोई इंतजाम। पूरा इलाज एक जूनियर डॉक्टर के हवाले छोड़ दिया गया और स्टाफ की लापरवाही ने स्थिति को और भयावह बना दिया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस अस्पताल के पास गंभीर मरीजों के इलाज का लाइसेंस था? क्या स्वास्थ्य विभाग ने इसकी कभी समीक्षा की? बड़हलगंज क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह अवैध और अपंजीकृत अस्पताल उग आए हैं—न योग्यता, न सुविधा, न मानक—लेकिन इलाज के नाम पर गरीबों की जेब काटने और उनकी जान से खिलवाड़ करने का गोरखधंधा बेधड़क चलता रहता है।
गांव की गरीब दलित बेटी अंबिका भी इसी सिस्टम का शिकार बनी। उसकी मां किरन देवी ने फूट-फूटकर कहा—
“आयुष्मान योजना का पैसा चढ़ाने के चक्कर में मेरी बच्ची को मार दिया। इलाज कम, बिल ज्यादा बनाने में रुचि थी।”
स्थानीय लोगों का भी कहना है कि बड़हलगंज में कई अस्पताल ऐसे हैं जहां न मेडिकल डिग्री रखने वाले लोग डॉक्टर बन बैठे हैं, न प्रशिक्षित नर्सें। सवाल उठते हैं—
क्या स्वास्थ्य विभाग आंखें बंद किए बैठा है?
क्या सिर्फ गरीब ही मरने के लिए छोड़े गए हैं?
क्या यह खुली डकैती नहीं है—जहां गरीब की जान कीमत बन जाती है?
अंबिका की मौत ने इलाके की जनता को झकझोर दिया है। ग्रामीणों ने साफ कहा है कि अगर ऐसे अस्पतालों पर ताला नहीं लगाया गया, तो गरीबों की मौत का सिलसिला खत्म नहीं होगा। लोग पूछ रहे हैं—
कब चलेगा प्रशासन का हंटर इन फर्जी अस्पतालों पर?
कब बंद होंगे यह मौत का धंधा?
पुलिस ने परिजनों की तहरीर पर मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है, लेकिन जनता को अब सिर्फ “जांच” नहीं, कार्रवाई चाहिए। अस्पताल का लाइसेंस रद्द हो, डॉक्टरों की डिग्री की जांच हो, और दोषियों को ऐसी सजा मिले कि भविष्य में कोई गरीब परिवार फिर कभी ऐसे अस्पताल का शिकार न बने।
अंबिका की मौत एक परिवार का गम नहीं,
यह पूरे बड़हलगंज क्षेत्र के स्वास्थ्य तंत्र के भ्रष्टाचार और गंदगी का आईना है।
यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई,
तो ऐसे अस्पताल इसी तरह गरीबों की लाशों पर खड़े होकर
मल्टीस्पेशियलिटी बनने का झूठा दावा करते रहेंगे।
—सुरेश राजभर