“चिल्लूपार की पुकार—अबकी बार अस्मिता चंद!”

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“चिल्लूपार की पुकार—अबकी बार अस्मिता चंद!”
वरिष्ठ समाजसेवी डॉ. देवेंद्र सिंह बघेल की कलम से

गोरखपुर जनपद के बांसगांव संसदीय क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली चिल्लूपार विधानसभा—एक ऐसा क्षेत्र, जिसकी पहचान सरयू के किनारे बसने के साथ-साथ, अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना, राजनीतिक उतार-चढ़ाव और दशकों से चले आ रहे विकास की प्यास से भी होती है। उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं में चिल्लूपार का उल्लेख हमेशा विशेष महत्व के साथ होता आया है। यह सिर्फ भौगोलिक विस्तार वाला क्षेत्र नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि इस विधानसभा का नेतृत्व अक्सर उन हाथों में गया, जिन पर दागों का साया अधिक और जनसेवा का प्रकाश कम दिखाई दिया। वर्षों तक ब्राह्मण बाहुल्य सीट मानकर यहां प्रतिनिधित्व एक ही वर्ग तक सीमित रहा—परंतु वह प्रतिनिधित्व भी कैसा? छवि हमेशा विवादों, आरोपों और अविश्वसनीयता से घिरी हुई।

अब 2027 का चुनाव धीरे-धीरे अपनी आहट देने लगा है। समय अभी भले ही दूर हो, परंतु राजनीतिक अखाड़े में खलबली शुरू हो चुकी है। दो दशक से अधिक समय से जो चेहरे सत्ता-सत्ता का खेल खेलते रहे, वे फिर सक्रिय हो उठे हैं। दौरे, दिखावे, संपर्क—सब कुछ शुरू। वर्तमान विधायक भी, जिन्होंने अपने पिछले चुनाव में इसे “अंतिम चुनाव” कहा था, फिर सक्रियता के साथ क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं। भाजपा के कुछ पदाधिकारी भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की दौड़ में लगे हुए हैं।

लेकिन इस बार चिल्लूपार की हवा बदली हुई है।
लोगों के दिलों में नया विश्वास, नई उम्मीद और नए नेतृत्व की तलाश है।

और इसी तलाश में एक नाम तेजी से उभर रहा है—
अस्मिता चंद।

अस्मिता चंद—महिला मोर्चा की प्रदेश उपाध्यक्ष, एक सादगीपूर्ण, निष्कलंक, तेजस्वी, मृदुभाषी और सरस्वती-स्वरूप व्यक्तित्व। वर्षों से चिल्लूपार की आधी आबादी—महिलाओं—की आवाज बनकर, उनके सुख-दुख में साथ खड़ी रही हैं। जिस चिल्लूपार में तीन-तीन, चार-चार पुरुष दावेदार मौजूद हैं, वहां महिला वर्ग का एकमात्र सशक्त, पवित्र और जनस्वीकृत चेहरा सिर्फ और सिर्फ अस्मिता चंद हैं।

चिल्लूपार की महिलाएं, जो अब तक सिर्फ वोट बनकर रह गई थीं, पहली बार महसूस कर रही हैं कि कोई उनके हिस्से की बात कर रहा है, कोई उनकी आवाज को मुख्यधारा में सम्मानपूर्वक ले जा रहा है।

भारतीय जनता पार्टी ने मध्य प्रदेश, बिहार और कई अन्य राज्यों में महिलाओं को जब-जब महत्वपूर्ण नेतृत्व दिया, परिणाम चमत्कारिक आए। नेतृत्व यदि साफ छवि वाला, जमीन से जुड़ा और संवेदनशील हो, तो जनता उसे सिर-माथे पर बैठाती है—यह इतिहास कहता है।

चिल्लूपार आज उसी इतिहास को दोहराना चाहता है।
विकास की आस, सुरक्षा की खोज और सम्मान की चाह लिए यह विधानसभा एक निष्कलंक चेहरे की तलाश में है—एक ऐसा चेहरा जिसे देखकर लोग कह सकें—“हाँ, यही है हमारा प्रतिनिधि। यही सुनेगा, यही समझेगा, और यही बदलेगा हमारे क्षेत्र की तस्वीर।”

अस्मिता चंद वह उम्मीद हैं, वह विश्वास हैं, वह प्रकाश हैं, जिनका दामन बेदाग है, जिनकी नीयत पारदर्शी है और जिनका जीवन जनसेवा को समर्पित है।
उनका व्यक्तित्व नारी-शक्ति की गरिमा बढ़ाता है और उनकी कार्यशैली क्षेत्र के हर वर्ग में एक नई ऊर्जा जगाती है।

चिल्लूपार आज पुकार रहा है—एक ऐसी प्रतिनिधि चाहिए जो सिर्फ नेता न हो, बल्कि बेटी भी हो, बहन भी, मां भी, और साथी भी।
जो सिर्फ सत्ता की राजनीति न खेले, बल्कि समाज की पीड़ा समझ सके।
जो सिर्फ भाषण न दे, बल्कि धरातल पर विकास का दीप जला सके।

और यह सब अस्मिता चंद में दिखाई देता है।

वर्षों से उपेक्षित यह विधानसभा आज एक नए अध्याय की ओर बढ़ रही है। और इस अध्याय का शीर्षक है—
“अस्मिता चंद—चिल्लूपार की अस्मिता, चिल्लूपार की नई दिशा।”

यह सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि चिल्लूपार की बदलती कहानी का आरंभ है।
यह वह तड़पती और फड़कती पुकार है—
अस्मिता चंद—अबकी बार!

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