

जूनियर डॉक्टरों की लापरवाही ने छीन ली मासूम अंबिका की जिंदगी! परिजनों का विलाप, न्याय की गुहार—“हमारी अंबिका हमें लौटा दो…”
- — सुरेश राजभर
गोरखपुर।
रामधनी मेमोरियल हॉस्पिटल में हुई कथित चिकित्सकीय लापरवाही ने एक मासूम जिंदगी को निगल लिया। अंबिका… एक मासूम, जिसकी आंखों में सपने थे, घर में खिलखिलाहट थी, लेकिन अस्पताल की उपेक्षा और जूनियर डॉक्टरों की उदासीनता ने उसके जीवन की डोर हमेशा के लिए तोड़ दी। परिवार का रो-रोकर बुरा हाल है। मां का विलाप, पिता का फूट-फूटकर रोना, भाई-बहनों की चीत्कार—सब कुछ देखकर लगता है जैसे पूरा घर अचानक सुनसान हो गया हो, मानो खुशियों की सांसें रुक गई हों।
परिजनों का कहना है कि अंबिका की हालत लगातार बिगड़ती रही। बार-बार रेफर करने की विनती की गई, लेकिन अस्पताल में मौजूद जूनियर डॉक्टर सीनियर डॉक्टर का इंतजार करते रहे। वही सीनियर डॉक्टर जिनकी अनुपस्थिति आज एक परिवार के आंसुओं की वजह बन गई। समय पर रेफर न करने की इस लापरवाही ने अंबिका की सांसें छीन लीं। परिवार की चीखें यही कहती हैं—
“अगर हमारी बेटी को समय रहते रेफर कर दिया गया होता, तो आज वह हमारे बीच होती…”
परिवार का आरोप है कि अस्पताल में आयुष्मान योजना के नाम पर मरीजों को सिर्फ “गिनती” का हिस्सा समझा जाता है। इलाज में देरी, जूनियर डॉक्टरों पर निर्भरता और सीनियर डॉक्टरों की गैरमौजूदगी जैसे हालात यहां आम बात बन चुके हैं। परिजनों ने दर्द के साथ कहा—
“हमारी बेटी कोई संख्या नहीं थी, वह हमारी दुनिया थी… उसे यूं मरने के लिए नहीं छोड़ा जाना चाहिए था।”
पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे थाना प्रभारी चंद्रभान सिंह ने उन्हें न्याय का भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा,
“आप चिंता न करें, FIR दर्ज की जाएगी और एक-एक जिम्मेदार पर कार्रवाई की जाएगी। आप अकेले नहीं हैं, प्रशासन आपके साथ खड़ा है।”
परिजनों के आंसुओं में रोष भी साफ दिखाई दे रहा है। उनकी मांग है कि अस्पताल की पूरी जांच हो, जिम्मेदार डॉक्टरों पर कड़ी कार्रवाई हो, और ऐसा सिस्टम बने कि किसी दूसरी अंबिका की जान लापरवाही की भेंट न चढ़े।
अंबिका के पिता की कमज़ोर आवाज़ बार-बार यही सवाल पूछती है—
“क्या हमारी बच्ची की मौत का कोई जवाब देगा? डॉक्टरों की लापरवाही कब रुकेगी?”
आज पूरा परिवार टूट चुका है। घर का हर कोना अंबिका की याद दिलाता है—उसकी हंसी, उसका बचपन, उसका हर सपना… सब चुपचाप दीवारों में दफन हो गया। लेकिन परिजनों के दिल में एक ही उम्मीद जिंदा है—
न्याय।
वे चाहते हैं कि उनकी बेटी की मौत बेवजह न जाए, और यह मामला एक मिसाल बने ताकि भविष्य में कोई और परिवार ऐसा दर्द न झेले।
अंबिका की मौत सिर्फ एक परिवार का हादसा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था के गहरे जख्म को उजागर करती एक सच्चाई है—कि लापरवाही सिर्फ गलत नहीं, घातक भी होती है।
— सुरेश राजभर