बड़हलगंज–हाटा–गगहा–गोला– क्षेत्र में अस्पतालों की बदहाली चरम पर!
मरीजों की रोजमर्रा की मौत से भी बदतर ज़िंदगी—कौन लेगा जिम्मेदारी?
— सुमन जी

गोरखपुर जनपद का बड़हलगंज, हाटा, गगहा, गोला और ग्रामीण क्षेत्र…
यह सिर्फ नक्शे का हिस्सा नहीं, बल्कि उन लोगों का घर है जो हर दिन उम्मीद लेकर अस्पतालों की दहलीज पर पहुंचते हैं—लेकिन घर लौटते हैं हताश होकर, कभी टूटी सांसों के साथ, तो कभी लाश के रूप में। क्षेत्र के अस्पतालों की स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि इसे “स्वास्थ्य सेवा” कहना भी मरीजों के दर्द का अपमान लगता है।
अंबिका की मौत सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि उस सड़ चुकी व्यवस्था का प्रतीक है जिसमें इंसान से ज़्यादा फाइलों की कद्र है, और जिंदगी से ज़्यादा डॉक्टरों की सुविधा। यह वह सच है जिसे यहां हर रोज हर परिवार अपने आंसुओं में घोलकर पीता है।
जूनियर डॉक्टरों की मनमानी, सीनियर डॉक्टरों की नदारदगी—मरीज मरें तो मरें!
बड़हलगंज से लेकर गगहा और गोला तक, लगभग हर निजी अस्पताल में “जूनियर डॉक्टर” ही भगवान बनकर बैठे हैं।
मरीज आए तो सिर हिलाकर दवा दे दो, हालत बिगड़े तो कह दो “सीनियर डॉक्टर आ रहे हैं”।
लेकिन सीनियर डॉक्टर?
या तो आते नहीं, या आते हैं तो सिर्फ फोटो खिंचवाने।
इलाज?
वह तो भगवान भरोसे!
आयुष्मान योजना—कागजों में मुफ़्त, ज़मीन पर मौत का सौदा
सरकार भले कहे कि गरीब को मुफ्त इलाज मिले, लेकिन क्षेत्र के अस्पतालों में आयुष्मान कार्ड वाले मरीजों को ऐसे देखा जाता है जैसे उन्होंने कोई अपराध कर दिया हो।
दिखावे के लिए भर्ती कर लो, लेकिन इलाज?
“जैसे-तैसे समय काटो… मरीज़ चाहे तड़पता रहे।”
यही वजह है कि अंबिका जैसी मासूम जान रेफर न होने की वजह से दम तोड़ देती है। क्या उसकी मौत एक दुर्घटना थी? नहीं! यह हत्या के बराबर लापरवाही है।
अस्पतालों में चलता है ‘नेतागिरी क्लिनिक’—इलाज से ज़्यादा राजनीति
कई डॉक्टर इलाज से ज्यादा राजनीति, कार्यक्रम और आयोजनों में सक्रिय रहते हैं। अस्पताल में मरीज भले छटपटाते रहें, लेकिन साहब बाहर मेडल, माला और मंचों पर व्यस्त!
ऐसा लगता है जैसे डॉक्टर नहीं, नेता बनकर आए हों।
मरीजों की जिंदगी इनके लिए बस “अगला केस” है—कोई इंसान नहीं।
मरीजों की चीखें—कहीं सुनाई क्यों नहीं देतीं?
गगहा और हाटा क्षेत्र में कई अस्पतालों में स्थिति इतनी खराब है कि लोग कहते हैं—
“यहां दवा कम, किस्मत ज़्यादा चलती है।”
इलाज में देरी, टेस्ट में लापरवाही, रेफर पर राजनीति, और पैसे की अंधी भूख…
इन सबके बीच मरीज मर रहा है, और अस्पताल चुप हैं।
अंबिका की मौत ने पूरे क्षेत्र की नींद तोड़ दी है। परिजनों से लेकर गांव के लोगों तक, अब एक ही मांग है—
“जांच करो, सख्त कार्रवाई करो, अस्पतालों की मनमानी बंद करो।”
थाना प्रभारी चंद्रभान सिंह ने दिया भरोसा—लेकिन सिस्टम कब जागेगा?
थाना प्रभारी ने भले FIR और कार्रवाई का वादा किया हो, लेकिन सवाल सिर्फ एक है—
क्या एक FIR से पूरे क्षेत्र की स्वास्थ्य दुर्दशा सुधर जाएगी?
नहीं।
जब तक प्रशासन पूरी ताकत से अस्पतालों की जांच नहीं करेगा, जब तक डॉक्टरों की जिम्मेदारी तय नहीं होगी, जब तक आयुष्मान कार्ड को “धंधा” बनाने वालों पर रोक नहीं लगेगी—
तब तक अंबिका जैसे अनगिनत बच्चे मरते रहेंगे।
सवाल बहुत कड़वा है—पर जवाब देना होगा
बड़हलगंज–हाटा–गगहा–गोला– ग्रामीण क्षेत्र के अस्पताल सिर्फ इमारतें हैं, सेवा नहीं।
अगर यह हाल रहा, तो लोग अस्पताल जाने से डरेंगे कि इलाज मिलेगा या कफ़न?
अब समय आ गया है कि प्रशासन एक कड़ी और ईमानदार कार्रवाई करे।
डॉक्टरों की जवाबदेही तय हो।
अस्पतालों की कार्यशैली का ऑडिट हो।
लापरवाहों पर ऐसी कार्रवाई हो कि फिर कोई मरीज हल्के में न लिया जाए।
अंबिका की मौत बेवजह न जाए—
यह सिर्फ परिवार का ही नहीं, पूरे क्षेत्र का सवाल है।
— सुमन जी