मानव शिक्षा सेवा संस्थान: विकास का दीपक या महत्वाकांक्षा का महल?

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संपादकीय

मानव शिक्षा सेवा संस्थान: विकास का दीपक या महत्वाकांक्षा का महल?

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— अनुपमा दुबे

गोरखपुर जिले के दक्षिणांचल में बड़हलगंज के पास बसे शरीफ गांव में एक संस्थान ऐसा खड़ा है, जिसने विकास की परिभाषा को अपने ढंग से लिखने की ठान रखी है। नाम है मानव शिक्षा सेवा संस्थान। यह संस्थान कोई साधारण संस्था नहीं, बल्कि गाँव के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को अपनी मुट्ठी में लेकर चलने वाली वह ताकत है, जिसकी चर्चा चौपालों से लेकर बाजारों तक होती है, और आलोचना घरों के कोनों में, धीरे से फुसफुसा कर।

संस्थान का दावा है कि वह महिलाओं को समूह बनाकर आर्थिक रूप से सशक्त कर रहा है—बचत, ऋण, रोजगार, प्रशिक्षण, विपणन… यानी हर वह काम जो सरकारें दशकों से फाइलों में दबाकर रखती हैं। महिलाएँ हर महीने थोड़ा-थोड़ा धन जोड़ती हैं, और एक तय अवधि के बाद वही पैसा कई गुना बढ़ा कर वापस मिलता है। साथ ही संकट के समय एक-दूसरे की मदद—मतलब सामाजिकता का ऐसा मॉडल, जिसे किताबों में पढ़ा तो बहुत जाता है, पर जमीनी रूप इतना सक्रिय शायद ही कहीं दिखे।

संस्थान की गतिविधियाँ यहीं नहीं रुकतीं। हर साल सैकड़ों निर्धन जोड़ों के निशुल्क विवाह, लघु उद्योगों की इकाइयाँ, मार्केटिंग चैन, रोजगार योजनाएं, सामाजिक सहायता कार्य—सब कुछ इतना सुव्यवस्थित कि विरोधियों के गले में फांस अटक जाए। हजारों महिलाएँ और पुरुष इस संगठन से जुड़े हैं, और यह संख्या रोज बढ़ रही है। अब ज़ाहिर है, जहां भीड़ होगी, वहां सवालों की लाठी भी उठेगी।

कुछ लोगों का मानना है कि यह सब तो विकास का छलावा है—ऊपर से चमकदार और अंदर से महत्वाकांक्षा का बड़ा सा महल। विरोधी कहते हैं कि संस्था का तेज़ी से बढ़ता प्रभाव राजनीतिक जमीन तलाशने की कोशिश है। कोई इसे स्वार्थ की उपज कहता है, तो कोई समीक्षा का दोष। लेकिन सत्य यह है कि जब विकास की गाड़ी सरपट दौड़ती है तो धूल तो चारों ओर उड़ती ही है। जिसे दिखाई न दे, वही खुद को अंधा समझे।

इस संस्थान का केंद्र बिंदु हैं—आलोक गुप्ता।

आलोक गुप्ता का जीवन खुद में एक कहानी है:

फर्श से अर्श तक का सफर, संघर्षों की गठरी, और आज सत्ता-सामाजिक संरचना के बीच एक ऐसा नाम, जिसे कोई नज़रंदाज़ नहीं कर सकता।

समर्थक कहते हैं—“गाँव में क्रांति लाई है।”

विरोधी कहते—“गाँव के नाम पर साम्राज्य खड़ा कर लिया!”

दरअसल, दोनों पक्ष सही भी हैं और गलत भी।

सच्चाई बीच में कहीं खड़ी मुस्कुरा रही है।

संस्थान के बढ़ते प्रभाव ने पंचायत स्तर से लेकर जिला राजनीति तक हलचल मचा दी है। निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ रही है, और यह बात कुछ लोगों को ऐसी लगती है जैसे किसी ने उनके आँगन में आकर पौधा लगा दिया हो—हरा-भरा भी और चुभता हुआ भी। समाज में परिवर्तन हर किसी को स्वीकार नहीं होता, और जो सबसे अधिक चिल्लाता है, वही प्रायः सबसे अधिक डरता भी है।

सवाल यह नहीं कि संस्था क्या कर रही है।

सवाल यह है कि जो कर रही है, वह समाज के लिए वरदान है या किसी बड़े खेल की छोटी शुरुआत?

फिलहाल निष्कर्ष यही है—

मानव शिक्षा सेवा संस्थान एक ऐसा सच है जिसे नज़रअंदाज़ करना अब किसी के बस में नहीं।

अच्छाई भी है, बुराई भी है, और दोनों के बीच खड़ा है विकास का वह आईना जिसमें हर व्यक्ति अपना चेहरा देख रहा है—और घबरा भी रहा है।

 

— अनुपमा दुबे

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