छपिया में न्याय का गला घोंटा गया!
स्टे ऑर्डर की धज्जियाँ उड़ाकर पुलिस की मौजूदगी में खड़ी कर दी गई अवैध दीवार
क्या गरीब की आवाज़ अब बेदम हो चुकी है?





— सुरेश राजभर की रिपोर्ट
बड़हलगंज/गोरखपुर। छपिया गांव में हुआ ताज़ा ज़मीन कब्जा मामला न सिर्फ प्रशासन की लापरवाही उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी उठाता है कि क्या अदालत के आदेशों का मूल्य अब शून्य हो चुका है?
गांव के पीड़ित किसान सत्येंद्र तिवारी की कृषि भूमि (गाटा संख्या 174, रकबा 0.045 हेक्टेयर) पर जिस तरह दबंगों ने पुलिस की मौजूदगी में कब्ज़ा कर पक्की दीवार खड़ी की, उसने पूरे क्षेत्र को हिला दिया है। ग्रामीण गुस्से में हैं और इसे न्याय व्यवस्था पर सीधा हमला बता रहे हैं।
स्टे ऑर्डर हाथ में… पुलिस ने लेने से कर दिया इनकार!
पीड़ित सत्येंद्र तिवारी बताते हैं कि उन्होंने 28 नवंबर 2025 को सिविल जज (जूनियर डिवीजन) से स्टे ऑर्डर प्राप्त किया था।
लेकिन जब वे आदेश लेकर थाना बड़हलगंज पहुँचे—
“पुलिस ने साफ कह दिया—हम यह आदेश नहीं लेंगे।”
112 हो या 1076 — हर जगह फोन किया, पर शिकायत धरी की धरी रह गई।
क्या यह वही पुलिस है जिस पर जनता भरोसा करती है?
क्या अदालत का आदेश पुलिस के लिए कोई मायने नहीं रखता?
29 नवंबर — सबसे काला दिन
पीड़ित के अनुसार शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक,
पुलिस और प्रशासन की मौन स्वीकृति के साथ
दबंगों ने विवादित भूमि पर पक्की दीवार खड़ी कर दी।
गांव में चर्चा है—
“यदि कोर्ट के आदेश के बावजूद गरीब की जमीन छीन ली जाए,
तो फिर इंसाफ कहां है, किसके लिए है?”
कानूनी विशेषज्ञ बोले—यह Contempt of Court का साफ मामला!
कानूनी जानकार इस घटना को न्यायिक आदेश का खुला उल्लंघन बताते हैं।
उनके अनुसार—
स्टे ऑर्डर के बावजूद कब्जा होने देना,
पुलिस का आदेश न लेना,
अवैध निर्माण रुकवाने में विफल रहना,
कब्जाधारियों को परोक्ष सुरक्षा देना,
ये सब सीधे-सीधे Contempt of Court और प्रशासनिक विफलता के दायरे में आता है।
“मेरी जमीन मुझे वापस चाहिए… बस न्याय चाहिए!” — सत्येंद्र तिवारी का दर्द
पीड़ित ने जिलाधिकारी, एसडीएम गोला, एसएसपी गोरखपुर और मुख्यमंत्री तक गुहार लगाई है।
उनकी मांगें स्पष्ट हैं—
• अवैध दीवार को तुरंत गिराया जाए
• दोषी पुलिसकर्मियों और दबंगों पर कठोर कार्रवाई
• स्टे ऑर्डर के अनुसार स्थिति को पूर्ववत बहाल किया जाए
• पूरे प्रकरण की पारदर्शी जांच
प्रशासन की चुप्पी—या फिर मिलीभगत?
छपिया का यह मामला अब केवल जमीन विवाद नहीं रहा, यह कानून की विश्वसनीयता,
पुलिस की निष्पक्षता,
और न्यायिक आदेशों के सम्मान की सबसे बड़ी परीक्षा है।
अगर कोर्ट का आदेश भी कागज़ बनकर रह जाए,
और पुलिस दबंगों के आगे घुटने टेक दे,
तो आम नागरिक की उम्मीद आखिर किससे बचेगी?
छपिया के ग्रामीणों का कहना है—
“यह लड़ाई सिर्फ सत्येंद्र तिवारी की नहीं,
यह लड़ाई न्याय की प्रतिष्ठा बचाने की है।”
यह घटना पूरे प्रदेश के लिए एक चेतावनी है कि
कानून अगर बेबस दिखने लगे,
तो समाज अराजकता की ओर बढ़ता है।
सुरेश राजभर
(विशेष संवाददाता)