पीसीएफ प्रबंधन की लापरवाही और खाद संकट पर भड़का किसानों का गुस्सा किसानों की आवाज़ अब दबकर नहीं, दहाड़ बनकर उठ रही है
✍️ सुरेश राजभर

गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में इन दिनों किसानों के धैर्य की परीक्षा हो रही है। खेती किसानी की रीढ़ माने जाने वाले खाद–बीज की कमी ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि खेतों में समय पर बुवाई तक नहीं हो पा रही। ऐसे गंभीर संकट में जब सरकारी तंत्र और सहकारी संस्थाओं से राहत की उम्मीद होती है, वहीं पीसीएफ (प्राथमिक सहकारी समिति/फेडरेशन) का अव्यवस्थित, धीमा और प्रबंधनहीन सिस्टम किसानों की परेशानियों को और बढ़ा रहा है। इसी गंभीर स्थिति को देखते हुए किसान नेता और पदाधिकारी एकजुट होकर व्यापक आंदोलन की तैयारी में हैं।
पीसीएफ निदेशक श्री चंद्रभूषण त्रिपाठी को किसानों की समस्याओं से अवगत कराते हुए माननीय पं. दिलीप किसान, भारतीय किसान यूनियन (लोक शक्ति) पूर्वांचल प्रभारी, जिलाध्यक्ष इदेश कुमार, मंडल सचिव छोटेलाल प्रजापति, जिला महासचिव जोखन प्रजापति तथा क्षेत्र के वरिष्ठ किसान कार्यकर्ताओं ने यह स्पष्ट कहा कि अब किसान चुप नहीं बैठेगा। खाद वितरण में हो रही धांधली, कतारों में घंटों खड़े रहने के बाद भी खाली हाथ लौटने की मजबूरी, कालाबाज़ारी की खुली कहानी और पीसीएफ की निष्क्रियता अब किसानों के सब्र को टूटने की कगार पर ले आई है।
खाद के लिए तरसते किसान – समस्या समझने की जरूरत कौन उठाए?
इस समय खेतों में रबी की बुवाई चरम पर है। यूरिया, डीएपी और एनपीके जैसी खादें किसानों के लिए जीवनरेखा हैं। लेकिन हालात यह हैं कि स्टॉक होने के बाद भी कई समितियों पर खाद समय से नहीं वितरित की जाती। किसानों को टोकन के नाम पर ठगने की शिकायतें बढ़ चुकी हैं। कई जगह देखा गया कि रातभर लाइन में खड़े रहने के बावजूद किसानों को सिर्फ आश्वासन मिला, खाद नहीं।
यह वही पीसीएफ है जिसका उद्देश्य किसानों को समय पर और उचित मूल्य पर खाद उपलब्ध कराना है, लेकिन वर्तमान प्रबंधन की उदासीनता ने किसानों को मजबूरी और आंदोलन के रास्ते पर ला खड़ा किया है।
बैठक में किसान यूनियन के नेताओं ने साफ कहा कि किसान की आवाज़ सरकार, प्रशासन और पीसीएफ तक पहुँचाना अब अनिवार्य हो चुका है।
पं. दिलीप किसान ने कहा—
“खाद के लिए किसानों को भटकने देना, यह सिर्फ लापरवाही नहीं बल्कि किसानों के साथ विश्वासघात है।”
वहीं जिला अध्यक्ष इदेश कुमार ने बताया कि पीसीएफ प्रबंधन की अनियमितताएं लंबे समय से जारी हैं, लेकिन इस बार किसानों की एकजुटता इसे सहन नहीं करेगी।
मंडल सचिव छोटेलाल प्रजापति ने चेतावनी देते हुए कहा—
“अगर जल्द सुधार नहीं हुआ तो हजारों किसान सड़क पर उतरकर आंदोलन को बाध्य होंगे।”
किसान आंदोलन क्यों जरूरी लग रहा है?
1. खाद की कालाबाज़ारी और वितरण में पारदर्शिता की कमी
2. समितियों पर किसानों की भीड़ लेकिन अधिकारियों का अता-पता नहीं
3. समय पर बुवाई न होने से फसल और आय दोनों पर खतरा
4. किसानों को अपमानजनक परिस्थितियों में लाइन में खड़ा होना
5. पीसीएफ प्रबंधन पर कार्रवाई की कमी
समाधान की दिशा में किसानों का प्रेरणादायक कदम
किसान यूनियन के पदाधिकारियों ने निर्णय लिया है कि खाद वितरण प्रणाली में सुधार, जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और किसानों के लिए पारदर्शी प्रक्रिया लागू होने तक आंदोलन जारी रहेगा। किसानों का एकजुट होना इस बात का प्रतीक है कि अब ग्रामीण भारत की रीढ़ – किसान – जाग चुका है और अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है।
अंत में—किसानों का धैर्य मत परखिए
किसान अपने खेत से राष्ट्र का पेट भरता है। अगर वही किसान खाद के लिए तरसेगा तो देश की खाद्यान्न सुरक्षा पर भी संकट आएगा। पीसीएफ प्रबंधन को यह समझना होगा कि किसान कोई वोट बैंक नहीं, यह देश की जीवनरेखा है। किसानों की समस्याएँ तत्काल सुनी जाएँ, तभी समाधान और विश्वास दोनों बन पाएँगे।
सुरेश राजभर