

राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत : पत्रकारों की आवाज़, संघर्ष का संकल्प और अधिकारों की निर्णायक लड़ाई — डॉ. देवेंद्र सिंह बघेल
राष्ट्रीय पर्यवेक्षक, राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत)
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत आज केवल एक औपचारिक संगठन भर नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा, अधिकार और स्वाभिमान की सामूहिक आवाज़ बन चुका है। यह संगठन उन पत्रकारों की पीड़ा, संघर्ष और जोखिम को मुखर करता है, जो गांव-गली, कस्बे, तहसील, जिला और दूर-दराज़ के क्षेत्रों में रहकर बिना संसाधन, बिना सुरक्षा और कई बार बिना पहचान के लोकतंत्र की सेवा कर रहे हैं।
देश के कोने-कोने में कार्यरत छोटे-बड़े पत्रकारों की समस्याओं को जिस मंच ने निरंतर सरकार, प्रशासन और समाज के सामने उठाया है, वह मंच है — राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत। जमीनी पत्रकारिता से उपजा यह संगठन आज प्रदेश, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुका है और पत्रकारिता के क्षेत्र में एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रहा है।
संघर्ष से संगठन तक की यात्रा
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत का निरंतर विस्तार इस बात का प्रमाण है कि पत्रकारों के हितों की लड़ाई अब केवल मांग नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित आंदोलन का रूप ले चुकी है। पत्रकारों पर बढ़ते हमले, फर्जी मुकदमे, धमकियां, असुरक्षित कार्य परिस्थितियां, आर्थिक अस्थिरता और सरकारी उपेक्षा जैसे मुद्दों पर संगठन ने कभी समझौता नहीं किया। यही कारण है कि आज यह संगठन पत्रकारों के बीच विश्वास, साहस और संरक्षण का दूसरा नाम बन गया है।
नेतृत्व जो संघर्ष से निकला
संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगदीश सिंह केवल एक अनुभवी जमीनी पत्रकार ही नहीं, बल्कि एक वरिष्ठ अधिवक्ता भी हैं। पत्रकारिता और कानून — इन दोनों क्षेत्रों का उनका गहन अनुभव संगठन को वैचारिक मजबूती और कानूनी धार प्रदान करता है। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत भावनात्मक नहीं, बल्कि संवैधानिक, कानूनी और नीतिगत स्तर पर पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। संगठन की प्रत्येक गतिविधि पर उनकी प्रत्यक्ष निगरानी यह सिद्ध करती है कि यह आंदोलन किसी औपचारिकता का नहीं, बल्कि प्रतिबद्ध संघर्ष का परिणाम है।
महिला प्रकोष्ठ : महिला पत्रकारों की सशक्त ढाल
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत का राष्ट्रीय महिला प्रकोष्ठ संगठन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सक्रिय इकाई के रूप में कार्य कर रहा है। महिला पत्रकार आज फील्ड रिपोर्टिंग, अपराध, राजनीति, सामाजिक सरोकार और खोजी पत्रकारिता जैसे जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। ऐसे में उनके सामने सुरक्षा, सम्मान, कार्यस्थल पर उत्पीड़न, सामाजिक दबाव और प्रशासनिक उपेक्षा जैसी दोहरी चुनौतियां हैं।
महिला प्रकोष्ठ की पदाधिकारीगण और महिला कार्यकर्ता न केवल महिला पत्रकारों की समस्याओं को संगठनात्मक मंच पर मजबूती से उठा रही हैं, बल्कि उनके लिए विशेष सुरक्षा प्रावधान, कानूनी सहायता, सम्मानजनक कार्य वातावरण और प्रतिनिधित्व की मांग को भी एजेंडा का अभिन्न हिस्सा बना रही हैं। संगठन यह स्पष्ट करता है कि महिला पत्रकारों की सुरक्षा और अधिकारों के बिना पत्रकारिता का सशक्त भविष्य संभव नहीं है।
नया घोषणा पत्र : मांग नहीं, दस्तावेज़ होगा
आज संगठन के वरिष्ठ राष्ट्रीय पदाधिकारी, प्रदेश नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की एक समर्पित टीम पत्रकारों के हितों से जुड़े एक नए घोषणा पत्र (मांग-पत्र) को अंतिम रूप देने में जुटी हुई है। यह घोषणा पत्र केवल मांगों की सूची नहीं, बल्कि सरकार के सामने पत्रकारों की वास्तविक स्थिति का दस्तावेज़ी आईना होगा।
इस घोषणा पत्र के निर्माण के लिए विभिन्न राज्यों की पत्रकार कल्याण योजनाओं, मान्यता प्रणालियों, सुरक्षा कानूनों और सामाजिक सुरक्षा ढांचे का गहन अध्ययन किया जा रहा है, जिससे संगठन तथ्यों, तुलनात्मक विश्लेषण और ठोस प्रस्तावों के साथ सरकार के समक्ष अपनी बात रख सके।
संभावित 10 प्रमुख मांगें
1. राष्ट्रीय पत्रकार सुरक्षा कानून का सख्त और प्रभावी निर्माण।
2. पत्रकारों की मान्यता प्रणाली को सरल, पारदर्शी और व्यापक बनाया जाए।
3. पत्रकारों को सरकारी बसों में निःशुल्क यात्रा एवं ट्रेनों में रियायत/पास सुविधा।
4. पत्रकारों के लिए पेंशन योजना लागू की जाए।
5. पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए स्वास्थ्य बीमा योजना अनिवार्य हो।
6. सरकारी बैठकों व कार्यक्रमों में पत्रकारों को सम्मानजनक आमंत्रण मिले।
7. संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारियों को औपचारिक मान्यता दी जाए।
8. समाचार कवरेज के दौरान वाहन व मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं।
9. पत्रकारों के बच्चों की शिक्षा हेतु छात्रवृत्ति योजनाएं।
10. वरिष्ठ पत्रकारों के अनुभव से प्रशिक्षण व शोध संस्थानों को प्रोत्साहन।
गुमनाम योद्धाओं का योगदान
इस संगठन को इस मुकाम तक पहुंचाने में अनेक गुमनाम, निस्वार्थ और समर्पित सहयोगियों का योगदान रहा है। राष्ट्रीय संरक्षक एवं भागवत द्विवेदी जैसे अनुभवी मार्गदर्शकों और वरिष्ठ पदाधिकारियों का मार्गदर्शन संगठन को निरंतर मिलता रहा है। संगठन यह मानता है कि नेतृत्व केवल मंच पर दिखने वालों से नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे संघर्ष करने वालों से भी बनता है।
सेल सिस्टम और संवेदनशीलता
राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत का मजबूत सेल सिस्टम पीड़ित पत्रकारों को कानूनी सहायता, परामर्श और सहयोग प्रदान करता है। यह व्यवस्था संगठन की संवेदनशीलता, जिम्मेदारी और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाती है।
समय के साथ बदलाव की आवश्यकता
संगठन यह भी स्वीकार करता है कि समय के साथ संरचनात्मक सुधार और समीक्षात्मक परिवर्तन आवश्यक हैं, ताकि संगठन और अधिक पारदर्शी, प्रभावी और संघर्षशील बन सके।
निष्कर्ष
अंततः राष्ट्रीय पत्रकार संघ भारत यह स्पष्ट संदेश देता है कि पत्रकारिता कोई अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यदि इस स्तंभ को कमजोर किया गया, तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा। इसलिए यह संगठन न झुकेगा, न रुकेगा और न थकेगा।
पत्रकारों के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों के लिए यह संघर्ष निरंतर चलता रहेगा..
पूरे जज्बे, पूरे साहस और पूरी ताकत के साथ।
राष्ट्रीय पर्यवेक्षक
डॉक्टर देवेंद्र सिंह बघेल