
प्रबंध संपादक अजय कुमार उपाध्याय
अंधेरे के विरुद्ध उजास का संकल्प
कलम से — वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता
डॉ. देवेंद्र सिंह बघेल
जहाँ निराशा की लंबी छायाएँ दिखाई देती हैं, वहीं उम्मीद का एक छोटा सा दीप भी पूरे अंधकार को चुनौती देने का सामर्थ्य रखता है। आज के समय में जब समाज के एक हिस्से में स्वार्थ, विघटन और अविश्वास की बातें बार-बार सामने आती हैं, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम उसी समाज की उन जीवंत धाराओं को भी देखें, जो प्रेम, सौहार्द, सहयोग और सामूहिकता से निरंतर बह रही हैं। क्योंकि समाज केवल टूटन की कहानियों से नहीं बनता, वह जुड़ाव की साधना से आकार लेता है।
यह सत्य है कि परिवर्तन का दौर तीव्र है, पर यह भी उतना ही सत्य है कि परिवर्तन केवल नकारात्मक नहीं होता। आधुनिकता यदि एक ओर भटकाव लाई है, तो दूसरी ओर उसने संवेदना के नए मंच भी दिए हैं। आज भी समाज में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ “एक दूसरे का हाथ थामने” से कारवां आगे बढ़ा है और मंज़िलें अपने आप करीब आती गई हैं। स्वयंसेवी संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, ग्राम सभाओं, महिला समूहों, युवा मंडलों और सामुदायिक प्रयासों ने यह सिद्ध किया है कि सामूहिक चेतना आज भी जीवित है।
भारतीय संस्कृति की आत्मा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव में निहित है। यह भाव केवल शास्त्रों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी आज प्रकट हो रहा है। आपदाओं के समय समाज जिस तरह एकजुट होता है, रक्तदान शिविर, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, सामूहिक विवाह, शिक्षा के लिए सामुदायिक सहयोग, वृद्धों और अनाथ बच्चों के लिए अपनत्व—ये सब उस सकारात्मक सामाजिक पूंजी के प्रमाण हैं, जो आज भी मजबूत है। यदि समाज पूरी तरह संवेदनाहीन होता, तो ये प्रयास संभव ही नहीं होते।
सामाजिकता का अर्थ केवल रिश्तों का निभाव नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व का साझा करना है। जब हम एक-दूसरे की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझते हैं, तभी समाज मजबूत बनता है। आज अनेक परिवारों में पीढ़ियों के बीच संवाद की नई परंपरा विकसित हो रही है। युवा तकनीक के माध्यम से बुजुर्गों की आवाज़ बन रहे हैं, और बुजुर्ग अनुभव के माध्यम से युवाओं को दिशा दे रहे हैं। यह समन्वय ही भविष्य की आधारशिला है।
सामूहिकता हमें अकेलेपन से बाहर निकालती है। जब व्यक्ति “मैं” से “हम” की यात्रा करता है, तभी समाज का निर्माण होता है। गाँवों में सामूहिक श्रम, शहरों में सामुदायिक अपार्टमेंट संस्कृति, मोहल्ला समितियाँ, स्वच्छता और पर्यावरण के साझा अभियान—ये सभी इस बात के संकेत हैं कि समाज टूट नहीं रहा, बल्कि नए रूप में संगठित हो रहा है। बदलते समय के साथ सामाजिकता के स्वरूप बदल रहे हैं, पर उसका मूल भाव आज भी जीवित है।
आपसी प्रेम और सौहार्द केवल भावनात्मक मूल्य नहीं, बल्कि सामाजिक विकास की सबसे बड़ी पूंजी हैं। जहाँ भरोसा होता है, वहाँ सहयोग स्वतः जन्म लेता है। जहाँ सहयोग होता है, वहाँ संघर्ष कम और समाधान अधिक होते हैं। यही कारण है कि जिन समाजों में परस्पर विश्वास मजबूत है, वे कम संसाधनों में भी अधिक प्रगति कर लेते हैं। प्रेम और सौहार्द से ही समावेशी विकास संभव है—जहाँ कोई पीछे न छूटे, और सब साथ चलें।
“कारवां बढ़ता गया, मंज़िलें चढ़ती गई”—यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक दर्शन है। जब हम एक-दूसरे की सफलता में अपनी सफलता देखते हैं, तब प्रतिस्पर्धा सहयोग में बदल जाती है। आज कई क्षेत्रों में सहकारिता मॉडल, स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और सामूहिक उद्यम इस दर्शन को साकार कर रहे हैं। ये मॉडल बताते हैं कि मिल-जुलकर आगे बढ़ना न केवल संभव है, बल्कि टिकाऊ भी है।
सकारात्मक दृष्टि का अर्थ समस्याओं से आँख चुराना नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में कदम बढ़ाना है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि समाज में चुनौतियाँ हैं, पर उनसे बड़ा हमारा सामूहिक सामर्थ्य है। यदि हम संवाद, संवेदना और साझेदारी को जीवन का हिस्सा बना लें, तो वही समाज जो आज प्रश्नों से घिरा दिखता है, कल उत्तरों का उदाहरण बन सकता है।
अंततः, समाज किसी एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि हम सब से बनता है। जब हाथ से हाथ मिलते हैं, तो केवल भीड़ नहीं बनती—एक उद्देश्य, एक दिशा और एक उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है। यही सामाजिकता की विजय है, यही मानवता की सार्थकता।
आइए, हम नकारात्मकता के शोर में सकारात्मक कर्म की आवाज़ को और ऊँचा करें—ताकि कारवां निरंतर आगे बढ़े और मंज़िलें स्वयं हमारे कदम चूमती जाएँ।