— अलविदा 2025 : स्मृतियों, सिसकियों और संकल्पों का वर्ष —

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— अलविदा 2025 : स्मृतियों, सिसकियों और संकल्पों का वर्ष —

कुछ वर्ष कैलेंडर के पन्नों में दर्ज होकर भी जीवन की आत्मा पर स्थायी हस्ताक्षर कर जाते हैं।
वर्ष 2025 ऐसा ही एक वर्ष बनकर मेरे जीवन में आया—जो आया तो था बारह महीनों के साथ, पर जाते-जाते तीन अमूल्य जीवन अपने साथ ले गया। यह वर्ष बीत तो जाएगा, पर इसकी टीस, इसकी रिक्तता और इसकी स्मृतियाँ जीवन भर मन के कोनों में चुभती रहेंगी।

इस वर्ष का पहला और सबसे गहरा आघात मेरी मां — श्रीमती गिरजा देवी का जाना था।
जिस मां का नाम गिरजा था, उनका स्वभाव भी उतना ही दिव्य और देवी तुल्य था।
मैंने मां के आँचल में केवल साया नहीं, संसार की सबसे सुरक्षित शरण पाई।
उनकी ममता में कोई शोर नहीं था, कोई दंड नहीं—बस शब्दों की सादगी और संस्कारों की गहराई थी।
पांच संतानों को उन्होंने कभी डांटकर नहीं, समझाकर इंसान बनाया।
मां, जो मनुष्य होकर भी देवी थीं, उनका जाना ऐसा था जैसे घर की दीवारें आज भी उन्हें ढूंढती हों।
उस शून्य से हम अभी उबरे भी नहीं थे कि नियति ने दूसरा वज्रपात कर दिया।

मेरे जीवन के पथ-प्रदर्शक, परिवार के मजबूत स्तंभ,
बड़े पिता जी — श्री राधेश्याम तिवारी
जिनकी एक छोटी-सी चेतावनी भी जीवन को सही दिशा दे देती थी।
उनका स्नेह अनुशासन में लिपटा हुआ था—
गलती पर सचेत करना और सही राह दिखाना उनका स्वभाव था।
वे अभिभावक थे, संरक्षक थे, और परिवार की नैतिक रीढ़ थे।
उनके जाने से ऐसा लगा मानो जीवन की दिशा बताने वाली कोई रोशनी अचानक बुझ गई हो।

पूरा परिवार अभी इस सदमे से संभल भी नहीं पाया था कि
तीसरी पीड़ा बनकर
श्री संतोष शुक्ल — हमारे परिवार के बड़े पिता जी के बड़े दामाद
हम सबको छोड़कर इस मृत्युलोक से विदा हो गए।
वे ऐसे व्यक्ति थे जो सुख-दुख में फर्क नहीं करते थे—
बस साथ निभाना जानते थे।
सच कहने का साहस, अपनों के लिए निष्पक्ष प्रेम और हर रिश्ते को मान देने का गुण—
वे हम सबके लिए एक भरोसे का नाम थे।
उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था,
बल्कि परिवार की मुस्कान का एक हिस्सा खो जाना था।

2025 ने हमें यह सिखाया कि
जीवन योजनाओं से नहीं, संवेदनाओं से चलता है।
यह वर्ष हमें रुलाता रहा, तोड़ता रहा,
लेकिन साथ ही यह भी सिखा गया कि
जो लोग हमें छोड़कर चले जाते हैं,
वे स्मृतियों में अमर होकर
हमें और अधिक मानवीय बना जाते हैं।

आज जब नया वर्ष दस्तक दे रहा है,
तो मन में उत्सव नहीं,
बल्कि एक शांत प्रार्थना है—
कि जिनकी कमी इस वर्ष ने दी है,
उनकी सीख, उनके संस्कार और उनका प्रेम
हमारे आचरण में जीवित रहे।

नया वर्ष केवल शुभकामनाओं का नाम नहीं,
बल्कि बीते दुखों को सम्मान के साथ याद कर
आगे बढ़ने का संकल्प है।

अलविदा 2025
तुम हमें बहुत कुछ छीनकर गए,
पर हमें यह भी सिखा गए कि
प्रेम कभी मरता नहीं—
वह केवल स्मृति बनकर
और गहराई से जीने लगता है।

नव वर्ष की शुभकामनाएँ
— आँसुओं के बीच आशा के दीप के साथ।

अनुपमा दुबे की कलम से

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