पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और सामाजिक संदेश — वरिष्ठ संवाददाता अनुपमा दुबे

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पुलिस की कार्यप्रणाली पर उठते सवाल और सामाजिक संदेश

— वरिष्ठ संवाददाता अनुपमा दुबे

 

गजपुर सड़क जाम प्रकरण और उरुवा थाना गेट पर बनी रील के प्रसारण ने एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर है, उन्हीं की भूमिका को लेकर जब जनता के बीच सवाल उठने लगें, तो यह स्थिति केवल एक प्रकरण तक सीमित नहीं रह जाती, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर असर डालती है।

 

गजपुर मामले में सड़क जाम, लाठीचार्ज, और उसके बाद दर्ज मुकदमे की प्रक्रिया अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि नामजद आरोपित शिखर गुप्ता की पुलिसकर्मियों के साथ सार्वजनिक कार्यक्रम में मौजूदगी की तस्वीरें सामने आ गईं। यह तस्वीरें केवल सोशल मीडिया की सनसनी नहीं हैं, बल्कि उस विरोधाभास की ओर इशारा करती हैं, जहां एक ओर पुलिस आरोपितों की तलाश की बात कहती है और दूसरी ओर वही आरोपित पुलिस के साथ मंच साझा करते दिखाई देते हैं। स्वाभाविक है कि आमजन के मन में यह प्रश्न उठे कि क्या कानून सबके लिए समान है?

 

इसी तरह उरुवा थाना गेट पर बनी रील का मामला भी पुलिस की आंतरिक अनुशासन व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है। थाना परिसर या उसके गेट पर नियमविरुद्ध वीडियो बनना और उसका खुलेआम प्रसारण यह दर्शाता है कि या तो पुलिस सतर्क नहीं है, या फिर इस तरह की गतिविधियों को हल्के में लिया जा रहा है। दोनों ही स्थितियां चिंता पैदा करती हैं।

 

इन घटनाओं के समानांतर मानव सेवा संस्थान का लगातार विवादों में रहना भी एक गंभीर सामाजिक प्रश्न बनता जा रहा है। बीते कुछ समय में इस संस्था और उससे जुड़े लोगों पर अनेक आरोप लगे हैं—पत्रकारों के बीच मारपीट, असहमति रखने वाले पत्रकारों के लिए असंसदीय भाषा का प्रयोग, कुछ नामी पत्रकारों को अपने पक्ष में कर अपने हित में खबरें लिखवाने के आरोप, संवैधानिक अधिकारों और प्रभाव का दुरुपयोग, जातिगत द्वेष को हवा देना, महिला शोषण, चोरी और धन के दुरुपयोग जैसे संदेहास्पद आरोप। भले ही इनमें से कई मामलों की सत्यता जांच का विषय हो, लेकिन लगातार उठते आरोप संस्था की छवि पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।

 

यह भी सच है कि मानव सेवा संस्थान द्वारा कुछ सकारात्मक कार्य किए गए होंगे, लेकिन जब कोई संगठन या व्यक्ति निरंतर विवादों के केंद्र में रहे, तो अच्छाइयां भी सवालों के शोर में दब जाती हैं। ऐसे में पुलिस प्रशासन का इनके साथ संरक्षण या निकटता का आभास देना, उन्हें एक तरह से “रोल मॉडल” के रूप में प्रस्तुत करना, समाज के लिए उचित संदेश नहीं देता।

 

जनप्रतिनिधियों का सहयोग यदि किसी संस्था या व्यक्ति को मिल रहा है, तो उसका उद्देश्य समाजसेवा और जनहित होना चाहिए। लेकिन जब उसी सहयोग का उपयोग व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं—जैसे जिला पंचायत चुनाव की तैयारियों—के लिए होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी चिंताजनक है। राजनीति और प्रशासन का यह घालमेल अंततः जनता के विश्वास को कमजोर करता है।

 

एसपी दक्षिणी द्वारा मामले की जांच सीओ बांसगांव को सौंपना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन असली कसौटी जांच के निष्कर्ष और उसके बाद होने वाली कार्रवाई होगी। पुलिस और प्रशासन को यह आत्ममंथन करना होगा कि उनके आचरण से समाज में क्या संदेश जा रहा है। कानून का डर खत्म होना, और प्रभावशाली लोगों का खुलेआम संरक्षण दिखना, लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

 

अंततः सवाल केवल एक फोटो या एक रील का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है, जहां निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही ही जनता का भरोसा कायम रख सकती है। प्रशासनिक अधिकारियों को यह समझना होगा कि उनका हर कदम समाज के लिए एक उदाहरण बनता है—अच्छा भी और बुरा भी।

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