*सभ्यता का पुनर्जागरण: विश्व की मूल शक्तियों को एकजुट करने का भारतीय संकल्प*

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*सभ्यता का पुनर्जागरण: विश्व की मूल शक्तियों को एकजुट करने का भारतीय संकल्प*


 

*लेखक: रजनीश शर्मा (पुरस्कार विजेता संपादक एवं विचारक)*

वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर जब भोर की पहली किरण के साथ एक हिंदू पुजारी अग्नि प्रज्वलित करता है, तो वह केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आह्वान होता है। ठीक उसी पल, हजारों मील दूर अमेरिका के ‘रेड इंडियन’ (Navajo) आदिवासी बुजुर्ग सेज (एक प्रकार की जड़ी-बूटी) जलाकर दिशाओं को नमन कर रहा होता है, और ऑस्ट्रेलिया के जंगलों में एक ‘एबोरिजिनल’ संरक्षक यूकेलिप्टस की धूनी से अपनी पवित्र भूमि का अभिषेक करता है।



भूगोल अलग हैं, भाषाएँ भिन्न हैं, लेकिन आत्मा एक है—प्रकृति के प्रति अटूट श्रद्धा, पूर्वजों से जीवंत संवाद और दृश्य-अदृश्य जगत के बीच एक दिव्य सामंजस्य।

 

आज के दौर में, जब एकेश्वरवादी विस्तारवाद और पश्चिमी वैश्वीकरण (Globalisation) पूरी दुनिया को एक ही सांचे (Homogenization) में ढालने पर तुले हैं, तब ये मूल सभ्यताएं मानवता की अंतिम उम्मीद हैं। भारत, जो विश्व की सबसे प्राचीन और निरंतर जीवित मूल सभ्यता (सनातन धर्म) का रक्षक है, आज उस मुकाम पर है जहाँ वह दुनिया के इन 47 करोड़ ‘मूल निवासियों’ को एक वैश्विक नेतृत्व प्रदान कर सकता है।

 

*1. ‘नेटिव’ बनाम ‘पैगन’: पश्चिम का भ्रम और हमारी वास्तविकता*

 

पश्चिमी जगत ने अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए गैर-अब्राहमिक सभ्यताओं को ‘पैगन’ (Pagan) जैसे शब्दों से अपमानित किया। उनके लिए ये संस्कृतियां ‘पिछड़ी’ थीं। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। ये ‘मूल’ सभ्यताएं विजय या तलवार के जोर से नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की कोख से जन्मी हैं।

 

*प्रकृति ही मंदिर है:* यहाँ देवता बादलों के पार नहीं, बल्कि नदियों, पर्वतों और वनों में बसते हैं। (जापान का शिंतो ‘कामी’ हो या भारत की ‘गंगा मां’)।

 

*सत्य के अनेक मार्ग:* ‘एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’—सत्य एक है, विद्वान उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। यह बहुलवाद ही मूल सभ्यताओं का डीएनए है।

 

*काल का चक्र:* समय यहाँ सीधी लकीर नहीं, बल्कि जन्म-मृत्यु-पुनर्जन्म का एक अंतहीन चक्र है।

 

*2. साझा जख्म और साझी विरासत*

दुनिया की हर मूल सभ्यता ने उपनिवेशवाद (Colonialism) का क्रूरतम प्रहार झेला है।

 

*ऐतिहासिक आघात:* 1492 के बाद अमेरिका में मूल निवासियों की जनसंख्या नरसंहार और धर्मांतरण के कारण 11 करोड़ से घटकर 1 करोड़ से भी कम रह गई। भारत ने भी 1200 साल का संघर्ष झेला; नालंदा जलाया गया और हजारों मंदिर तोड़े गए।

 

*आधुनिक संकट:* आज अमेजन के जंगलों की कटाई हो या मिशनरियों द्वारा भारत के 10% आदिवासियों पर किया जा रहा धर्मांतरण का प्रहार—चुनौतियां आज भी वही हैं।

किन्तु, भारत का लचीलापन (Resilience) अद्भुत है। जहाँ अन्य सभ्यताएं संग्रहालयों की वस्तु बन गईं, भारत का सनातन आज भी 40 लाख सक्रिय मंदिरों और 140 करोड़ लोगों की धड़कन में जीवित है।

 

*3. भारत: मूल सभ्यताओं का ‘बड़ा भाई’*

भारत केवल इन समुदायों का मित्र नहीं, बल्कि उनका आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शक (Big Brother) है।

 

*दार्शनिक साम्य:* हमारा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और आदिवासियों का ‘धरती माता’ का दर्शन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

 

*अनुष्ठानों की एकता:* यज्ञ का धुआं और नेवाजो की ‘स्मजिंग’ (Smudging) एक ही आध्यात्मिक भाषा बोलते हैं।

 

*जनसांख्यिकीय शक्ति:* भारत के 11 करोड़ आदिवासी और 80% सनातन अनुयायी मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा ‘नेटीविस्ट’ समूह बनाते हैं।

 

*4. ‘ग्लोबल नेटिव अलायंस’: एक भविष्यवादी दृष्टिकोण*

अब समय आ गया है कि भारत दिल्ली से एक “ग्लोबल नेटिव अलायंस” (GNA) की नींव रखे। यह गठबंधन किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपनी जड़ों के पक्ष में होगा।

 

*क्यों नेतृत्व करे भारत?*

 

*नैतिक अधिकार:* भारत ने कभी किसी देश पर अपनी संस्कृति थोपने के लिए आक्रमण नहीं किया।

 

*सॉफ्ट पावर:* योग, आयुर्वेद और वेदांत पहले से ही वैश्विक स्वीकृति पा चुके हैं।

 

*आर्थिक सामर्थ्य:* $4.2 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था और ‘ग्लोबल साउथ’ का नेतृत्व भारत को विश्वसनीय बनाता है।

 

*गठबंधन के लाभ:*

 

*सांस्कृतिक संप्रभुता:* लुप्त होती भाषाओं और रीतियों का संरक्षण।

 

*आर्थिक सशक्तिकरण:* पारंपरिक औषधि (Traditional Medicine) और हस्तशिल्प का $100 अरब का वैश्विक व्यापार।

 

*जलवायु नेतृत्व:* आधुनिक विज्ञान जब थक जाएगा, तब मूल निवासियों का ‘प्रकृति-प्रेम’ ही पृथ्वी को बचाएगा।

 

*निष्कर्ष:* युगधर्म का आह्वान

ऋग्वेद का उद्घोष है— “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (अर्थात: सभी दिशाओं से श्रेष्ठ विचार हमारे पास आएं)।

 

आज दुनिया एकरसता और उपभोक्तावाद से ऊब चुकी है। उसे भारत की विविधता और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की आवश्यकता है। यह भारत के नेताओं, संतों और युवाओं का ‘युगधर्म’ है कि वे इस वैश्विक गठबंधन का नेतृत्व करें। जैसे दीपक जलने पर अंधेरा स्वयं छंट जाता है, वैसे ही भारत का सनातन प्रकाश इन प्राचीन सभ्यताओं के भविष्य को रोशन करेगा।

 

विश्व प्रतीक्षा कर रहा है—भारत के नेतृत्व की। 

 

*रजनीश शर्मा एक लेखक और पुरस्कृत संपादक हैं। उनसे इस ईमेल पर संपर्क किया जा सकता है: rshar121920@gmail.com*

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